दीये की रोशनी
जब एक छोटा-सा “सॉरी” पूरे घर को फिर से घर बना देता है
EMOTIONAL / FAMILY DRAMA
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1/8/20261 min read
शहर के पुराने मोहल्ले में शर्मा परिवार का दो-मंज़िला घर था। बाहर से साधारण, लेकिन भीतर रिश्तों की गर्माहट से भरा। पिता महेश शर्मा सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त हो चुके थे। माँ सुमन हर बात में संतुलन ढूँढने वाली, जैसे घर की धड़कन। बड़ा बेटा रोहित निजी कंपनी में काम करता था और छोटा बेटा आदित्य कॉलेज में पढ़ता था। बहू नेहा घर में नई थी—पर उसकी मुस्कान में अपनापन था, बस वह धीरे-धीरे खुलती थी।
पर पिछले कुछ महीनों से घर की हवा बदलने लगी थी। रोहित देर से आता, फोन पर लगातार किसी से बात करता। सुमन पूछतीं तो रोहित बस इतना कह देता—“काम बढ़ गया है माँ।” महेश जी चुप रहते, पर उनकी आँखें सब देख लेतीं। आदित्य को यह सब “बड़े लोगों के मामले” लगते, वह अपने कमरे में गाने सुनकर खुद को दूर रखता। नेहा सबसे ज़्यादा परेशान थी, क्योंकि उसे लगने लगा था कि वह इस घर में “ठीक से फिट” नहीं हो पा रही।
एक शाम सुमन ने रसोई में चाय रखते हुए कहा, “नेहा बेटा, आज तुम थकी लग रही हो।”
नेहा ने हँसने की कोशिश की, “नहीं माँ… बस थोड़ा सिर भारी है।”
“हमारे घर में ‘बस’ के पीछे बहुत कुछ छिपा होता है,” सुमन ने धीमे से कहा। “कह दो तो हल्का हो जाए।”
नेहा की आँखें भर आईं। “माँ, मैं चाहती हूँ कि सब पहले जैसा हो जाए। रोहित जी बात-बात पर चिड़ जाते हैं। लगता है मैं हर जगह गलत हूँ। मैं कोशिश करती हूँ, फिर भी…।”
सुमन ने उसके सिर पर हाथ रखा। “घर में किसी की जगह ‘परफेक्ट’ होने से नहीं बनती, ‘अपना’ होने से बनती है। तुम अपनी हो।”
नेहा रो पड़ी, पर उसी पल बाहर से रोहित की आवाज़ आई—“नेहा! पानी कहाँ है?” आवाज़ में थकान थी, पर उसमें रूखापन भी था। नेहा चुपचाप उठी और पानी ले गई। महेश जी अख़बार से नजरें उठाकर उसे जाते देख रहे थे—उनकी आँखों में चिंता थी, पर शब्द नहीं।
उस रात खाने की मेज़ पर सन्नाटा था। दाल की कटोरी बीच में थी, पर कोई दिल से “और लो” नहीं कह रहा था। आदित्य ने माहौल हल्का करने के लिए कहा, “माँ, आज की सब्ज़ी तो कमाल है।” पर रोहित ने बिना देखे जवाब दिया, “हम्म।” और फोन की स्क्रीन पर उँगली चलाने लगा।
महेश जी ने पहली बार सख़्त स्वर में कहा, “फोन नीचे रखो, रोहित। घर में बैठकर घर से बाहर मत रहो।”
रोहित चौंका। “पापा, मैं थका हूँ। ऑफिस में बहुत प्रेशर है।”
“प्रेशर सब पर है,” महेश जी बोले, “पर घर पर हम एक-दूसरे का प्रेशर कम करते हैं, बढ़ाते नहीं।”
नेहा ने बात काटने की कोशिश की, “पापा, कोई बात नहीं…”
लेकिन महेश जी ने हल्के से हाथ उठाया, “बेटा, तुम चुप नहीं, तुम बोलो। घर में चुप्पियाँ जब आदत बन जाती हैं, तब रिश्ते धीमे-धीमे टूटने लगते हैं।”
रोहित ने कुर्सी पीछे खिसकाई। “आपको लगता है मैं जानबूझकर ऐसा कर रहा हूँ? किसी को मेरी हालत समझ नहीं आती।”
सुमन ने शांत आवाज़ में कहा, “समझ आती है, बेटा। पर जब तुम नहीं बोलते, तो हम क्या समझें? सिर्फ तुम्हारा तनाव, या उसका भी अकेलापन?” उन्होंने नेहा की ओर देखा।
रोहित के चेहरे पर एक पल के लिए अपराधबोध झलका, फिर वह उठकर अपने कमरे में चला गया। आदित्य घबरा गया। “माँ, मैं… मैं देखता हूँ भैया को।”
“रुको,” महेश जी बोले। “आज उसे अकेला मत रहने देना, पर उसके सामने उपदेश भी मत रखना। बस उसे बताना कि घर उसके साथ है।”
आदित्य कमरे में गया तो रोहित बिस्तर पर बैठा था, सिर दोनों हाथों में दबाए। आदित्य ने बिना कुछ कहे एक गिलास पानी रखा और पास बैठ गया।
कुछ देर बाद रोहित धीमे से बोला, “आदि, कभी-कभी लगता है मैं सबको निराश कर रहा हूँ।”
आदित्य ने पहली बार गंभीर होकर कहा, “भैया, आप निराश नहीं कर रहे… बस आप दूर हो गए हो। और जब आप दूर होते हो, तो नेहा भाभी भी अकेली हो जाती हैं।”
रोहित की आँखें नम हो गईं। “मैंने चाहा नहीं… बस नौकरी का डर, जिम्मेदारियाँ… और फिर कंपनी में छँटनी की बातें… मैं रोज़ खुद से लड़ रहा हूँ। मैंने नेहा को बताया नहीं, क्योंकि मुझे लगा वह घबरा जाएगी।”
“पर छिपाने से वो घबराई नहीं?” आदित्य ने नरम सवाल किया।
रोहित चुप रह गया। उसी चुप्पी में उसे अपनी गलती साफ दिखने लगी—उसने दबाव को अपने भीतर बंद किया और उसके दरवाज़े पर रूखापन टाँग दिया।
अगले दिन घर में दीवाली की सफाई शुरू हुई। हालांकि त्योहार में कुछ दिन बाकी थे, पर सुमन का मानना था—“घर जितना साफ होगा, मन भी उतना हल्का होगा।” नेहा चुपचाप पर्दे उतार रही थी। रोहित सामने आया तो उसने देखा—नेहा की उँगलियों पर हल्की खरोंचें थीं, आँखों के नीचे नींद की कमी का धुंधलापन।
वह बोलना चाहता था, पर शब्द गले में अटक गए। फिर उसने बस इतना कहा, “नेहा… तुम थोड़ी देर बैठ जाओ, मैं कर देता हूँ।”
नेहा ने आश्चर्य से देखा। “आप? रहने दीजिए…”
“नहीं,” रोहित ने पहली बार आवाज़ में विनम्रता रखी। “मैं… मैं कुछ देर तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ।”
नेहा की आँखों में अनकहा दर्द भी था और उम्मीद भी। वे दोनों ड्रॉइंग रूम में बैठे। रोहित ने धीरे-धीरे अपनी नौकरी की चिंता, भविष्य का डर, और अपने भीतर के तनाव की बात बताई। बोलते-बोलते उसकी आवाज़ भर्रा गई। “मुझे लगा मैं सब संभाल लूँगा, लेकिन… मैंने तुम्हें बिना वजह चोट पहुँचाई।”
नेहा ने पहली बार खुलकर कहा, “मुझे आपकी नौकरी का डर नहीं था। मुझे आपके बदल जाने का डर था। मुझे लगा आप मुझे अपने ‘घर’ में नहीं मानते।”
रोहित ने उसकी हथेलियाँ थाम लीं। “तुम मेरा घर हो, नेहा। मैं बस डर गया था… और डर में मैंने सबसे गलत तरीका चुना।”
नेहा की आँखों से आँसू गिरने लगे, पर इस बार वे कड़वे नहीं थे—वे राहत के थे। रोहित ने धीमे से कहा, “सॉरी।” इतना साधारण शब्द, पर उसके भीतर पूरा परिवार छिपा था।
शाम को महेश जी बैठक में दीये की बातियाँ काट रहे थे। सुमन रसोई में मिठाई का घोल चला रही थीं। आदित्य लाइट्स चेक कर रहा था। रोहित और नेहा साथ आए। रोहित ने सबके सामने कहा, “माँ, पापा… मैं पिछले दिनों बहुत चिड़चिड़ा रहा। मैं अपना डर आपसे साझा नहीं कर पाया। माफ कर दीजिए।”
महेश जी ने उसकी पीठ थपथपाई। “माफी नहीं, समझदारी चाहिए थी। और वह आज दिख रही है।”
सुमन ने मुस्कुरा कर कहा, “जब बेटा बोल दे, तो माँ की आधी चिंता यूँ ही उतर जाती है।”
आदित्य ने हँसते हुए कहा, “तो अब दीवाली पर पटाखे कम, बातें ज़्यादा होंगी।”
सब हँस पड़े। हँसी वैसी ही थी, जैसी पहले हुआ करती थी—सच्ची, घर जैसी।
दीवाली की रात आई। घर के आँगन में दीये जल रहे थे। नेहा ने रंगोली बनाई थी और रोहित ने उसके साथ बैठकर किनारों पर चमक बढ़ाई थी। महेश जी ने दीये रखते हुए कहा, “देखो, दीया छोटा होता है, पर अँधेरा बड़ा। फिर भी दीया हारता नहीं।”
सुमन ने जोड़ा, “क्योंकि दीया रोशनी बाँटता है, अँधेरा नहीं।”
रोहित ने नेहा की ओर देखा—और धीरे से बोला, “अब मैं अँधेरा नहीं बनूँगा। अगर डर होगा तो बोलूँगा, और अगर टूटूँगा तो साथ माँगूँगा।”
नेहा ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। “और मैं भी चुप नहीं रहूँगी। हम दोनों मिलकर घर को घर रखेंगे।”
सकारात्मक निष्कर्ष
रिश्तों में सबसे बड़ा उपचार समझ और संवाद होता है। जब परिवार के लोग एक-दूसरे की बात सुनते हैं, डर बाँटते हैं और “मैं ठीक हूँ” के पीछे छुपे दर्द को पहचानते हैं, तब घर की दीवारें नहीं—दिल मजबूत होते हैं। क्योंकि परिवार वही है जहाँ गलतियाँ होने पर दरवाज़े बंद नहीं होते, बातचीत के दीये जलाए जाते हैं।
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Disclaimer: यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। किसी वास्तविक व्यक्ति/घटना से इसका कोई संबंध नहीं है। इसका उद्देश्य केवल प्रेरणा और सकारात्मक संदेश देना है।
Note: यह किसी प्रकार की कानूनी सलाह नहीं है। व्यक्तिगत स्थिति के लिए विशेषज्ञ से सलाह लें।